बचपन की खिड़की पर मंडरा रहा स्क्रीन का खतरा:नजरअंदाज न करें बच्चों की आंखें सिकोड़ने या सिरदर्द की शिकायत

Sep 30, 2026 - 18:05
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बचपन की खिड़की पर मंडरा रहा स्क्रीन का खतरा:नजरअंदाज न करें बच्चों की आंखें सिकोड़ने या सिरदर्द की शिकायत

खैरथल (हीरालाल भूरानी)

आज के आधुनिक दौर में बच्चों का बचपन मोबाइल, टैबलेट, कंप्यूटर और टीवी की स्क्रीनों के बीच सिमटता जा रहा है। पढ़ाई के बढ़ते दबाव और लंबे समय तक स्क्रीन या किताबों को पास से देखने की आदत का सीधा असर बच्चों की आंखों पर पड़ रहा है। ऐसे में बच्चों की आंखों की रोशनी की सुरक्षा केवल डॉक्टरों की नहीं, बल्कि माता-पिता, शिक्षकों और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी बन गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में दृष्टि संबंधी समस्याओं को शुरुआती चरण में पहचानना कठिन होता है, क्योंकि बच्चा यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी दृष्टि सामान्य से अलग है। कई बार एक आंख की रोशनी कमजोर होने पर भी बच्चा दूसरी आंख से काम चलाता रहता है, जिससे समस्या बढ़ती जाती है।

किन शुरुआती संकेतों को न करें नजरअंदाज?

यदि आपका बच्चा किताब या मोबाइल बहुत पास रखकर देखता है, टीवी के बेहद करीब बैठता है, दूर की चीजें देखने के लिए आंखें सिकोड़ता है, बार-बार आंखें मलता है या पढ़ाई के दौरान सिरदर्द व आंखों में थकान की शिकायत करता है, तो माता-पिता को तुरंत सावधान हो जाना चाहिए। इसके अलावा, बच्चे का पढ़ाई में अचानक कमजोर होना हमेशा लापरवाही नहीं, बल्कि दृष्टि दोष का संकेत भी हो सकता है।

स्क्रीन बंद करना ही काफी नहीं, इन बातों का रखें ध्यान

हर बच्चे में चश्मे का नंबर बढ़ने का कारण केवल मोबाइल या टीवी नहीं होता। मायोपिया (निकट दृष्टिदोष) में आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारक भी भूमिका निभाते हैं। इसलिए केवल स्क्रीन बंद कर देना ही पर्याप्त नहीं है:

  • बच्चों को प्रतिदिन पर्याप्त समय खुले वातावरण और बाहरी खेलों के लिए प्रोत्साहित करें।

  • पढ़ते समय कमरे में उचित रोशनी रखें तथा किताब व आंखों के बीच सही दूरी बनाए रखें।

  • लंबे समय तक लगातार पास की गतिविधियां करने से बचें और बीच-बीच में आंखों को आराम दें।

  • बिना नेत्र जांच के बच्चे को कभी भी किसी अन्य व्यक्ति का चश्मा न पहनाएं और आंखों में समस्या होने पर खुद से कोई दवा न डालें।

एक छोटी सी सावधानी, जीवनभर की स्पष्ट दृष्टि

बच्चों की आंखें उनके भविष्य की खिड़की हैं। आज की छोटी-सी लापरवाही उनके आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए आंखों की रोशनी कम होने का इंतजार न करें—समय पर नेत्र विशेषज्ञ से जांच कराएं।

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