राग-द्वेष का भेदन कर ही प्राप्त किया जा सकता है 'अरिहंत पद': गौतम मुनि महाराज
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) लक्ष्मणगढ़ तहसील के ग्राम बिचगांवा स्थित जैन धर्मशाला में इन दिनों धर्म की गंगा बह रही है। मधुर व्याख्यानी श्रद्धेय श्री गौतम मुनि जी म.सा. एवं व्याख्यात्री महासती श्री सरलेश प्रभा जी म.सा. आदि ठाणा के पावन सानिध्य में आयोजित आध्यात्मिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्म लाभ ले रहे हैं।
भक्ति और आराधना का संगम
जैन श्वेताम्बर समाज के अध्यक्ष अजीत कुमार जैन ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 9:00 बजे साध्वियों के सानिध्य में आरती, मंगल दीपक, सर्व महाअभिषेक एवं अष्ट प्रकार की पूजा के साथ हुआ। भजनों और मंत्रोच्चार से संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया।
अरिहंत पद और नवकार महामंत्र की महिमा
विशेष प्रवचन श्रृंखला के दौरान वैराग्यपूर्णा जी ने नवपद की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नवपद हमें जीवन में नम्रता और विवेक धारण करने का संदेश देता है। उन्होंने कहा: "नवकार महामंत्र सभी मंत्रों में सर्वोत्तम है, इसीलिए इसे 'मंत्राधिराज' कहा जाता है। अरिहंत पद का ध्यान करने से आत्मा में अनंत ज्ञान और अनंत दर्शन के गुण प्रकट होते हैं।"
प्रवचनों में बताया गया कि अरिहंत चार घाती कर्मों के विनाशक हैं। नवकार महामंत्र में अरिहंत को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया है क्योंकि वे तीर्थ स्थापना के माध्यम से विश्व का महान उपकार करते हैं और केवल ज्ञान के माध्यम से जगत को कल्याण का मार्ग दिखाते हैं।
पाप कर्मों का नाश और समता की प्राप्ति
सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि राग और द्वेष का भेदन करके ही आत्मा अरिहंत पद को प्राप्त कर सकती है। समाधि का अर्थ केवल ध्यान नहीं, बल्कि विषमता का त्याग और समता की प्राप्ति है। उन्होंने बताया कि 'नमो अरिहंताणं' के एक पद के जाप मात्र से दुखों का विनाश होता है, जबकि संपूर्ण नवकार महामंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से सागरोपम जितने नरक कर्मों का क्षय हो जाता है।
श्वेतांबर महासभा के कार्यकारिणी सदस्य प्रदीप जैन ने बताया कि ग्राम बिचगांवा में चल रही इस ज्ञान गंगा से समाज के प्रत्येक वर्ग में उत्साह है और युवा पीढ़ी भी जैन धर्म के सिद्धांतों से रूबरू हो रही है।


