पर्युषण पर्व: लक्ष्मणगढ़ के श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में भक्तिभाव से पूजा-अर्चना, 9वें दिन 'उत्तम आकिंचन धर्म' की हुई आराधना
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) पर्वराज पर्युषण के पावन अवसर पर कस्बे के श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में गुरुवार को पर्व के 9वें दिन 'उत्तम आकिंचन धर्म' की विशेष आराधना की गई। इस दौरान मंदिर में प्रातकाल से ही धार्मिक अनुष्ठानों की धूम रही और बड़ी संख्या में जैन धर्मावलंबियों ने भाग लेकर धर्म लाभ अर्जित किया।
धार्मिक अनुष्ठान एवं तत्वार्थ सूत्र वाचन
कार्यक्रम की शुरुआत में भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। शांतिधारा कराने का सौभाग्य भागचंद जैन एडवोकेट परिवार को प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् मंदिर जी में तत्वार्थ सूत्र के 9वें अध्याय का वाचन किया गया। संध्या काल में नियमित प्रतिक्रमण, महाआरती एवं धर्म सभा में प्रवचन के कार्यक्रम भक्तिमय माहौल में संपन्न हुए।
"आत्मा ही आकिंचन धर्म स्वरूपी है": मोनित जैन
नवयुवक मंडल के मोनित जैन ने उत्तम आकिंचन धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि 'आकिंचन' का अर्थ आत्मा है—अर्थात जिसके पास कुछ भी अपना सांसारिक नहीं है, वही आकिंचन है।
- सांसारिक मोह से मुक्ति: हमने जो कुछ भी भौतिक रूप में पाया या कमाया है, वह हमारी आत्मा का हिस्सा नहीं है। यदि मनुष्य इस सत्य को स्वीकार कर ले, तो वस्तुओं को पाने की अंधी दौड़ और सांसारिक दुखों से मुक्ति मिल सकती है।
- आत्मा का वास्तविक स्वरूप: पद, प्रतिष्ठा और धन-दौलत के पीछे भागना व्यर्थ है। मनुष्य खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही जाएगा। जीवन की इस सच्चाई को स्वीकार करना ही आत्मा का सच्चा स्वरूप है।
- सच्चा सुख आत्मा में: आजकल व्यक्ति बाहरी दिखावों में उलझा हुआ है। एक इच्छा पूरी होती ही वह दूसरी के पीछे भागने लगता है, यही मोह दुखों का कारण है। वास्तविक सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की तृप्ति में निहित है।

