संतान की दीर्घायु और खुशहाली के लिए माताओं ने रखा निर्जला व्रत, अहोई अष्टमी पर गूंजी लोक कथाएं
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/ कमलेश जैन) कस्बे सहित समूचे उपखंड क्षेत्र में कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर अहोई अष्टमी का पर्व पारंपरिक श्रद्धा, लोक संस्कृति और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। माताओं ने अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की मंगलकामना को लेकर पूरे दिन निर्जला व्रत रखा।
पर्व को लेकर अलसुबह से ही घरों में धार्मिक अनुष्ठानों का दौर शुरू हो गया। ग्रामीण व कस्बाई क्षेत्रों में महिलाओं ने तड़के सूर्योदय से पूर्व स्नान कर व्रत का संकल्प लिया। क्षेत्र में आज भी पारंपरिक लोक कला की झलक देखने को मिली, जहाँ महिलाओं ने घर की स्वच्छ दीवारों पर गेरू (लाल मिट्टी) और चौक की मदद से आठ कोनों वाली पारंपरिक आकृति में अहोई माता, उनके सात पुत्रों और बच्चों के सुंदर चित्र उकेरे।
पूजा-अर्चना के दौरान अहोई माता को शुद्ध घी से निर्मित 8 पूड़ी, 8 मीठे पुए और हलवे का विशेष भोग अर्पित किया गया। महिलाओं ने हाथ में गेहूं के दाने लेकर साहूकार के सात बेटों और स्याऊ माता से जुड़ी पौराणिक व्रत कथा का श्रवण किया।
संध्याकाल में आकाश में तारे उदित होने पर महिलाओं ने लोटे में भरे पवित्र जल और कच्चे दूध से तारों को अर्घ्य दिया तथा संतान की लंबी उम्र व उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना की। इसके उपरांत माताओं ने अपनी संतान के हाथों से जल ग्रहण कर और हलवा-पूड़ी का प्रसाद पाकर उपवास खोला।
स्थानीय पंडित लोकेश कुमार ने पर्व के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अहोई अष्टमी का व्रत देवी अहोई के असीम आशीर्वाद का वाहक है। विधि-विधान से किया गया यह व्रत संतान को आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करता है, साथ ही परिवार में सुख, शांति, सद्भाव और समृद्धि का संचार कर जीवन के संकटों का निवारण करता है।

