महाराजा भर्तृहरि का नीतिगत न्याय और ब्राह्मण कन्या से नृत्यांगना बनी मोहिनी
अलवर (अनिल गुप्ता) पारसी शैली पर आधारित एकमात्र संस्था श्री राजर्षि अभय समाज अलवर द्वारा महाराजा भर्तृहरि का नाटक मंचित किया गया। महाराजा भर्तृहरि नाटक के एक प्रसंग में उज्जैन के नगर सेठ और तेली के मध्य विवाद का महाराजा भर्तृहरि द्वारा बहुत ही चतुर पूर्ण एवं नीतिगत न्याय किया गया, जिसमें उन्होंने तेली को न्याय दिया और सेठ को गलत सिद्ध किया।
इसके बाद दर्शाया गया कि उज्जैन के सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण चंद्रशेखर शास्त्री अपने मित्र सेठ मायादास के पास आकर अपने हृदय की वेदना प्रकट करते हैं। जिसमें चंद्रशेखर शास्त्री सेठ मायादास से कहते हैं कि उनका एक नायक जाति की स्त्री के प्रेम जाल में फंसने से ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया और उन दोनों की प्रेम लीला में एक कन्या का जन्म भी हुआ, परंतु कन्या के जन्म के बाद वह स्त्री उन्हें और उस कन्या को छोड़कर चली जाती है। इस पर सेठ मायादास कहते हैं कि यह भी कोई पश्चाताप की बात है भला जवानी की हवा किसे नहीं लगती, इसलिए चिंता मत करो और अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए तपस्या करने के लिए जाओ और तुम्हारी कन्या मोहिनी का मैं ध्यान रखूंगा।
इसके बाद मोहिनी को सेठ मायादास के सुपुर्द कर चंद्रशेखर शास्त्री कैलाश पर्वत पर तपस्या के लिए चले जाते हैं। इसके बाद सेठ मायादास धनोपाजर्न और अपने व्यापार के घाटे की पूर्ति के लिए मोहिनी को नृत्यांगना बनने के लिए कहते हैं, जिस पर मोहिनी बार बार मना करती हैं किंतु सेठ मायादास उसे नृत्यांगना बनाकर धनोपाजर्न करता हैं।

