जैन धर्मावलंबी ने रोटतीज का त्यौहार पूर्ण श्रद्धा भाव से मनाया
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) भारत त्योहारों का देश है। यहां हर दिन नित-नए त्योहार मनाए जाते हैं। एक ओर जहां हिन्दू धर्म में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन हरतालिका तीज का पर्व मनाया जाता है। वहीं आज के दिन जैन धर्म में रोटतीज का त्योहार जैन धर्मावलंबी के यहां मनाया जाता है। जैन धर्म का रोटतीज एक विशेष पर्व है। जो की भाद्रपद शुक्ल तृतीय के दिन आज मनाया गया।
इस व्रत में केवल एक ही अनाज से बने भोजन का सेवन किया जाता है। यह व्रत केवल पूजा का ही प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह आत्मा की मुक्ति के मार्ग को याद करने का अवसर भी प्रदान करता है। इसके साथ ही इस पर्व से यह भी संदेश मिलता है कि भौतिक सुख-सुविधाएं जीवन का आधार नहीं हैं, बल्कि संयम ही सच्चा सुख देता है।
कस्बे में जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा आज रोट तीज व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर स्वच्छ कपड़े पहनने के बाद व्रत का संकल्प लिया गया। अधिकांश घरों में व्रत रखा गया। कई घरों में स्त्रियां और पुरुष दोनों ने व्रत रखा । जैन मंदिर पहुंच कर 24 तीर्थंकरों की पूजा की गई जिसे चौबीसी विधान कहते हैं।
पुरुषों द्वारा भगवान की मूर्तियों का अभिषेक किया गया। विधि विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद व्रत कथा का पाठ किया गया। व्रत में रोट, खीर दही और तुरई की सब्जी बनाई गई । पूजन के बाद यह भोग गाय को खिलाया गया ।
क्या हैं नियम
रोट तीज का व्रत 3, 12, या फिर 24 वर्षों तक रखा जा सकता है। इस दिन एकासन किया जाता है, जिसमें दिन में केवल एक बार, एक अन्न का रोट खाया जाता है। आज के दिन दान देने का भी जैन धर्म में अधिक महत्व माना गया है।
कस्बे में व्रत करने वाले साधकों द्वारा केवल धर्म ध्यान में लीन ही नहीं, नकारात्मक विचारों व आचरण का त्याग करने का संकल्प भी उनके द्वारा लिया गया। रोटतीज का मुख्य उद्देश्य मानसिक शांति प्राप्त करना और मोक्ष की ओर अग्रसर होना है।
जैन मुनियों का कहना है - रोटतीज याद दिलाती है, थाली में रोट हो, हृदय में श्रद्धा हो,वाणी में जिनवाणी हो और जीवन में संयम हो। तभी पर्व वास्तव में सार्थक है।

