पांडूपोल मेले में उमड़ा आस्था का सैलाब: घर-घर जली हनुमान जी की ज्योत, सरिस्का की वादियों में गूंजे बजरंगबली के जयकारे
पांडूपोल मेले में उमड़ा आस्था का सैलाब: घर-घर प्रज्वलित हुई बजरंगबली की ज्योत, जयकारों से गुंजायमान हुआ सरिस्का
अलवर / अनिल गुप्ता
अलवर के ऐतिहासिक व पौराणिक स्थल पांडूपोल हनुमान मंदिर में मंगलवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। पांडूपोल मेले के उपलक्ष्य में जिला प्रशासन द्वारा घोषित अवकाश के चलते सुबह से ही सरिस्का के घने जंगलों के बीच स्थित मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहा। लोगों ने परिवार सहित लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन कर देश व परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। वहीं, कई श्रद्धालुओं ने अपने-अपने घरों में पांडूपोल हनुमान जी की अखंड ज्योत जलाकर भक्तिभाव से पूजा-अर्चना की।
अज्ञातवास और भीम के अहंकार मर्दन की पौराणिक गाथा
पांडूपोल मंदिर का इतिहास महाभारत कालीन मान्यताओं से गहराई से जुड़ा है। कथा के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान जब पांडव सरिस्का के जंगलों से गुजर रहे थे, तब महाबली भीम को अपनी शारीरिक शक्ति पर अहंकार हो गया था। उनके घमंड को चूर करने के लिए हनुमान जी ने एक वृद्ध वानर का रूप धारण किया और रास्ते में अपनी पूंछ फैलाकर बैठ गए। भीम ने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन वे पूंछ को टस से मस न कर सके। इसके बाद पांडवों ने इसी पवित्र स्थान पर हनुमान जी की 'शयन प्रतिमा' (लेटी हुई मूर्ति) स्थापित की, जो आज पूरे देश में आस्था का प्रमुख केंद्र है।
गदा प्रहार से बनी 'पोल' बनी पहचान
जनश्रुति के अनुसार, पांडवों के मार्ग में जब विशाल पर्वत बाधा बना, तब भीम ने अपनी गदा से प्रहार कर पहाड़ के बीचो-बीच एक विशाल रास्ता (छेद) बना दिया था। स्थानीय बोली में इस छेद या रास्ते को ‘पोल’ कहा जाता है, जिससे इस पावन धाम का नाम 'पांडूपोल' पड़ा। मेले के दौरान श्रद्धालुओं ने इस प्राकृतिक मार्ग और धाम के दर्शन कर मनोकामनाएं मांगी।

