वैर में जलझूलनी एकादशी की धूम: ढोल-नगाड़ों के साथ निकले ठाकुरजी के डोले, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा से दम तोड़ती रियासतकालीन परंपराएं
जलझूलनी एकादशी पर नगर भ्रमण पर निकले भगवान: भक्ति रस में डूबी 'लघुकाशी' वैर, उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहीं रियासतकालीन धार्मिक परंपराएं
वैर (भरतपुर) कोशलेन्द्र दत्तात्रेय
बाबा मनोहर दास जी महाराज की पवित्र तपोस्थली और 'लघुकाशी' के नाम से विख्यात कस्बा वैर में जलझूलनी एकादशी का पावन पर्व अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्री दामोदर जी महाराज और श्री दाऊजी महाराज मंदिर से ठाकुरजी सुसज्जित बांस के डोलों में विराजमान होकर अपने भक्तों की कुशलक्षेम जानने और दर्शन देने नगर भ्रमण पर निकले।
मंत्रोच्चार और पंचामृत अभिषेक के साथ उठी शोभायात्रा प्रातःकाल मंदिर प्रांगण में श्रद्धालुओं ने ठाकुरजी का पंचामृत से विधि-विधानपूर्वक अभिषेक किया। इसके पश्चात प्रभु को नवीन मनमोहक पोशाक धारण कराकर आकर्षक डोलों में विराजमान किया गया। महाआरती के बाद बैंड-बाजे और जयकारों की गूंज के साथ शोभायात्रा रवाना हुई। नगर के चांदनी चौक, लाल चौक, पुरानी अनाज मंडी और नगायच मंदिर होते हुए ठाकुरजी का डोला गुजरा। इस दौरान पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर प्रभु का स्वागत किया, भोग लगाया और आरती उतारी। कई श्रद्धालुओं ने ठाकुरजी का प्रसाद ग्रहण कर अपना एकादशी का निर्जला व्रत खोला। वहीं, नवजात शिशुओं की दीर्घायु और आरोग्य की कामना के साथ परिजनों ने उन्हें भगवान के डोले के नीचे से निकाला।
रियासतकालीन परंपराओं पर प्रशासनिक अकर्मण्यता का ग्रहण स्थानीय बुजुर्गों ने बताया कि वैर में रियासत काल से ही जलझूलनी एकादशी पर ठाकुरजी के नगर भ्रमण की परंपरा चली आ रही है। प्राचीन काल में ठाकुरजी का डोला ऐतिहासिक प्रताप नहर पर विश्राम के लिए ठहरता था, जहां भक्तों के लिए केला, ककड़ी आदि फल-प्रसाद नहर में प्रवाहित किए जाते थे और श्रद्धालु नहर में छलांग लगाकर उस प्रसाद को प्राप्त करते थे।
हालांकि, समय की विडंबना और शासन-प्रशासन की उपेक्षा के चलते यह गौरवशाली परंपरा अब अपना अस्तित्व खोती दिख रही है। वर्तमान में प्रताप नहर पूरी तरह सूख चुकी है, उसमें गंदगी का अंबार है और पानी के आवक मार्गों पर अतिक्रमण हो चुका है। प्रशासनिक अनदेखी के कारण रियासतकालीन धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरें दम तोड़ रही हैं, जिससे नई पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक परंपराओं से वंचित होती जा रही है। कस्बे के प्रबुद्ध जनों ने प्रशासन से इस ऐतिहासिक नहर का जीर्णोद्धार कराने और परंपराओं को सहेजने की मांग की है।

