सुजान गंगा को पुनः “जीवनदायिनी” बनाकर पर्यटन एवं जन-आकर्षण का प्रमुख केंद्र विकसित का दिया सुझाव; मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को लिखा पत्र
भरतपुर( विष्णु मित्तल)। सुजान गंगा नहर को केवल सफाई एवं सौंदर्यीकरण की परियोजना के रूप में देखने के बजाय भरतपुर की ऐतिहासिक पहचान, पर्यावरणीय विरासत और “जीवनदायिनी जलधारा” के रूप में पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। इसके लिए विशेषज्ञों एवं प्रोफेशनल एजेंसी के माध्यम से दीर्घकालीन मास्टर प्लान तैयार कराकर इसे पर्यटन, पर्यावरण, रोजगार और जन-सुविधाओं से जोड़ने की आवश्यकता है। यह बात समृद्ध भारत अभियान के निदेशक सीताराम गुप्ता ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को भेजे पत्र में कही है।
गुप्ता ने कहा कि सुजान गंगा पर विगत वर्षों में किए गए कार्यों, प्रस्तावित कार्यों तथा वर्तमान स्थिति को प्रमुखता से उठाया गया है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि कई स्थानों पर गंदगी, जलकुंभी और कचरे की समस्या बनी हुई है, तो यह संकेत है कि समस्या का समाधान केवल निर्माण एवं सफाई कार्यों से नहीं होगा। इसके लिए जल प्रवाह, जल गुणवत्ता, सीवेज प्रबंधन और दीर्घकालीन रखरखाव को केंद्र में रखकर समग्र योजना बनानी होगी। लगभग 40–45 वर्ष पूर्व तक सुजान गंगा में लोग स्नान करते थे और यह भरतपुर के सामाजिक एवं जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। यदि इसके ऐतिहासिक स्वरूप को आधुनिक तकनीक एवं वैज्ञानिक जल प्रबंधन के साथ पुनर्जीवित किया जाए तो यह भरतपुर की एक विशिष्ट पहचान बन सकती है।
गुप्ता ने सुझाव दिया कि सुजान गंगा के पुनर्विकास के लिए नदी एवं जलधारा पुनर्जीवन, पर्यावरण, शहरी डिजाइन, पर्यटन तथा जल प्रबंधन के विशेषज्ञों वाली प्रोफेशनल एजेंसी/कंसल्टेंट से विस्तृत मास्टर प्लान एवं DPR तैयार कराई जाए। टाटा जैसी प्रतिष्ठित तकनीकी एवं प्रबंधन क्षमता वाली संस्थाओं के अनुभव का भी उपयोग किया जा सकता है। चयनित क्षेत्रों में आकर्षक घाट, पैदल पथ, साइकिल ट्रैक, हरित क्षेत्र, बैठने की व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था, छोटे उद्यान और लैंडस्केपिंग विकसित की जा सकती है। इसके साथ स्थानीय कला, संस्कृति, खान-पान, हस्तशिल्प और लोक-संगीत के लिए उपयुक्त स्थान विकसित कर इसे पर्यटन एवं रोजगार से जोड़ा जा सकता है
गुप्ता ने कहा कि सुजान गंगा में गिरने वाले गंदे नालों और सीवेज को रोकना तथा उसका वैज्ञानिक उपचार करना आवश्यक है। केवल जलकुंभी और कचरा हटाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। स्वच्छ जल की उपलब्धता, पर्याप्त जल प्रवाह और नियमित जल गुणवत्ता की निगरानी के लिए स्थायी प्रणाली विकसित करनी होगी
उन्होंने सुझाव दिया कि जयपुर की द्रव्यवती नदी, बीकानेर के सूरसागर और अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट जैसी परियोजनाओं का तकनीकी अध्ययन कराया जाए तथा भरतपुर की भौगोलिक, पर्यावरणीय एवं ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुरूप उपयोगी तकनीकी उपाय अपनाए जाएं। सी एस आर और पी पी पी के माध्यम से भी हो सकती है भागीदारी, परियोजना का उद्देश्य केवल निर्माण पूरा करना नहीं बल्कि उसके दीर्घकालीन संचालन, रखरखाव और जल गुणवत्ता को बनाए रखना होना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि सुजान गंगा के पुनर्विकास के लिए उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित कर विस्तृत डीपीआर एवं मास्टर प्लान तैयार कराया जाए तथा कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी निगरानी की व्यवस्था की जाए।
यदि सुजान गंगा को वैज्ञानिक एवं प्रोफेशनल दृष्टिकोण से पुनर्जीवित किया जाता है तो यह केवल सफाई और सौंदर्यीकरण की परियोजना नहीं रहेगी, बल्कि “जल संरक्षण + विरासत संरक्षण + पर्यटन + रोजगार + पर्यावरण” को जोड़ने वाली भरतपुर की महत्वपूर्ण परियोजना बन सकती है।
उन्होंने कहा कि सुजान गंगा भरतपुर की ऐतिहासिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। इसे पुनः “जीवनदायिनी” बनाना केवल एक विकास कार्य नहीं, बल्कि शहर की विरासत को भविष्य से जोड़ने का अवसर है।

