पितृपक्ष की शुरुआत: तर्पण और पिंडदान से प्रसन्न होंगे पूर्वज; जानिए श्राद्ध कर्म, पंचबली और खान-पान के सही नियम
लक्ष्मणगढ़ (अलवर) कमलेश जैन
सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का पावन पर्व 'पितृपक्ष' शनिवार से शुरू हो गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन 15 दिनों में पितर धरती पर अपने परिजनों के बीच आते हैं। अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, मोक्ष और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तर्पण, पिंडदान एवं श्राद्ध कर्म करने का विशेष विधान है। योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि श्राद्ध कर्म तभी पूर्ण फलदायी होता है, जब इसे शास्त्रोक्त नियमों व पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाए।
खान-पान में सात्विकता और रसोई की पवित्रता जरूरी
पंडित लोकेश कुमार के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान घर में 15 दिनों तक सात्विक एवं बिना प्याज-लहसुन का भोजन ही बनना चाहिए। मांस-मदिरा, तीखे एवं अत्यधिक मसालेदार खान-पान से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। श्राद्ध के पकवानों में दूध, शुद्ध देशी घी, शहद, जौ और काले तिल का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। भोजन पकाने वाले व्यक्ति को स्नान-ध्यान कर पूर्ण स्वच्छता के साथ ही रसोई में प्रवेश करना चाहिए।
दोपहर के समय और दक्षिण दिशा में करें तर्पण
तर्पण या श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के समय (अपराह्न काल) में किया जाना चाहिए, सूर्यास्त के समय श्राद्ध करना वर्जित है। पूजा के दौरान अपना मुख हमेशा दक्षिण दिशा की ओर रखें, क्योंकि इसे पितरों की दिशा माना गया है। श्राद्ध कर्म स्वयं के स्वामित्व वाली भूमि, मंदिर या किसी पवित्र नदी के तट पर ही करना चाहिए। तर्पण में कुशा (पवित्र घास) और काले तिल का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है।
ब्राह्मण भोज और 'पंचबली' का विशेष महत्व
श्राद्ध के दिन योग्य ब्राह्मणों को आदरपूर्वक बुलाकर सात्विक भोजन कराएं तथा अपनी सामर्थ्य अनुसार वस्त्र, अनाज व दक्षिणा देकर विदा करें। बिना दान-दक्षिणा के श्राद्ध अधूरा माना जाता है। इसके अतिरिक्त भोजन में से 5 हिस्से—देवताओं, गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए अवश्य निकालें। इस 'पंचबली' के माध्यम से ही अर्पित किया गया भोजन पितरों तक पहुंचता है।
पितृपक्ष में इन बातों का रखें विशेष ध्यान (क्या न करें):
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वर्जित कार्य: इन 15 दिनों में बाल, दाढ़ी और नाखून कटवाने से बचें।
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मांगलिक कार्य स्थगित रखें: विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नई संपत्ति या वाहन की खरीदारी तथा बड़ी यात्राएं टालनी चाहिए।
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घर में रखें शांति: घर में क्लेश, वाद-विवाद या क्रोध न करें, इससे पितर रुष्ट होकर लौट जाते हैं।
वास्तु अनुसार लगाएं पूर्वजों की तस्वीर
वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूर्वजों की तस्वीर कभी भी मंदिर, बेडरूम या घर के मुख्य केंद्र (ब्रह्मस्थान) में नहीं लगानी चाहिए। पितरों की तस्वीर हमेशा घर की दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) दीवार पर ही लगाएं। साथ ही, पितृपक्ष के दौरान प्रतिदिन संध्या समय घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करना शुभ माना जाता है।

