एनसीईआरटी पाठ्यक्रम में शामिल होगी ब्रज के वीर गोकुला जाट की गाथा:"16 अंगों को 16 पहरों में काटा गया, पर झुके नहीं"
भरतपुर / राजस्थान (विष्णु मित्तल)
भारतीय इतिहास में ऐसे कई प्रसंग और वीर योद्धा रहे हैं जिन्होंने विदेशी और अत्याचारी शासकों के खिलाफ अपने प्राणों की आहुति दे दी। आने वाले समय में विद्यार्थियों को ऐसे ही एक महान योद्धा का इतिहास कक्षा नौ की एनसीईआरटी सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में पढ़ने को मिलेगा। हम बात कर रहे हैं ब्रज क्षेत्र के महान वीर गोकुला जाट की, जिन्होंने मुगलों के धार्मिक उत्पीड़न, जजिया कर और मंदिरों के विध्वंस के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह का बिगुल बजाया था।
मुगल अत्याचार और ब्रज का विद्रोह
अकबर और जहांगीर भले ही खुद को न्यायप्रिय शासक बताते रहे हों, लेकिन उनके और विशेषकर औरंगजेब के शासनकाल में हिंदुओं पर भीषण अत्याचार हुए। हिंदुओं से जजिया कर वसूलना, धार्मिक पाबंदियां लगाना, और मंदिरों को ध्वस्त करना आम बात थी। इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार के अनुसार, हिंदुओं की हत्या करना और मंदिरों को तोड़ना मुगलों के लिए एक 'पुण्य कार्य' माना जाता था।
ऐसी स्थिति में ब्रज क्षेत्र के जाटों ने इस अन्याय का डटकर सामना किया। खास बात यह है कि इस संघर्ष में केवल पुरुषों ने ही नहीं, बल्कि वीरांगना जाटनियों ने भी मुगलों के खिलाफ अदम्य साहस का परिचय दिया। यूरोपीय यात्री मनुची ने अपने वृत्तांत में लिखा है कि यह जाट विद्रोह मुगलों की नाक के नीचे पनप रहा था, जो विश्व इतिहास में एक दुर्लभ घटना थी।
वीर गोकुला का नेतृत्व और संघर्ष
शुरुआत में इस विद्रोह का नेतृत्व वीर नंदराम ठेनुआ ने किया था। उनकी शहादत के बाद गोकुल सिंह और उनके भाई उदय सिंह ने इस आंदोलन की कमान संभाली। गोकुल सिंह मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, हिंडौन और महावन की जनता के लोकप्रिय नेता बने, और 'तिलपत' (तिलू गढ़ी) उनका प्रमुख केंद्र था।
वर्ष 1666 में जब छत्रपति शिवाजी महाराज को आगरा में कैद किया गया था, लगभग उसी दौरान गोकुल सिंह ने जाटों का नेतृत्व संभाला। जब उन्होंने मुगलों को कर देने से साफ इनकार कर दिया, तो क्रूर शासक औरंगजेब स्वयं एक विशाल सेना लेकर उनके दमन के लिए निकला।
10 मई 1666 को महावन के पास सिहोरा गांव में एक भीषण युद्ध हुआ। जाटों की 20,000 की सेना ने तीन दिनों तक मुग़ल सेना का डटकर मुकाबला किया। इस भयंकर संघर्ष में 5 हजार जाट और 4 हजार मुगल सैनिक मारे गए, परंतु अंततः वीर गोकुला, उनके भाई उदय सिंह और 7,000 जाट योद्धाओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
वीर गोकुला की अद्वितीय शहादत
गिरफ्तारी के बाद गोकुल सिंह को आगरा कोतवाली के चबूतरे पर हजारों लोगों की भीड़ के सामने जंजीरों में जकड़कर लाया गया। औरंगजेब ने उनके सामने इस्लाम स्वीकार करने की शर्त रखी, लेकिन वीर गोकुला ने अपने धर्म और स्वाभिमान के साथ कोई समझौता करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद उन पर अमानवीय और दुर्दांत यातनाओं का दौर शुरू हुआ:
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सबसे पहले उनका एक हाथ कुल्हाड़ी से काट दिया गया, जिससे रक्त की धारा बह निकली (इतिहास में यही स्थान आज 'फव्वारा चौराहा' कहलाता है)।
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इसके बाद धीरे-धीरे उनके 16 अंगों को 16 पहरों में काटा गया।
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अंततः 1 जनवरी 1670 को उनका शीश धड़ से अलग कर दिया गया।
वीर गोकुला ने हिंदू धर्म, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया। उनके बलिदान के ठीक 20 वर्ष पश्चात, छत्रपति संभाजी महाराज ने भी औरंगजेब के ऐसे ही क्रूर अत्याचारों का सामना करते हुए अपना बलिदान दिया। इन महान विभूतियों का संघर्ष हमें सदैव स्वतंत्रता और धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित करता रहेगा।
लेखक एवं इतिहासकार – डॉ. सुधा चौधरी

