श्री जड़खोर गौधाम में श्रीमद्भागवत कथा का दूसरा दिन: संतों के सान्निध्य में गूंजे भगवन्नाम, दस हजार गौवंश के संरक्षण पर हुई चर्चा
डीग (राजस्थान) नीरज जैन
राजस्थान के डीग जिले के कामवन क्षेत्र स्थित प्रतिज्ञा वन के श्री जड़खोर गौधाम में आयोजित नौ दिवसीय भव्य श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रसामृत का पान करने का सौभाग्य मिला। अग्रपीठाधीश्वर मलूकपीठाधीश्वर श्रीमद् जगद्गुरु द्वाराचार्य स्वामी श्री राजेंद्र दास जी महाराज ने मानव जीवन की दुर्लभता, निष्काम भक्ति, परम धर्म और गौसेवा की महिमा का अत्यंत प्रेरक और विस्तृत वर्णन किया। कथा का विधिवत शुभारंभ श्री गणेशदास भक्तमाली वेद विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत सुंदर वैदिक मंत्रोच्चार एवं सांस्कृतिक-धार्मिक प्रस्तुतियों के साथ हुआ।
गौसेवा और वैदिक शिक्षा का अनूठा संगम
कथा से पूर्व, पूज्य श्री दीनबंधु दास जी महाराज और गौधाम के सक्रिय ट्रस्टी श्री अचिंत्य गर्ग जी ने गौधाम की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि श्री जड़खोर गौधाम के अंतर्गत संचालित पाँच गौशालाओं में वर्तमान में लगभग दस हजार गौवंश का संरक्षण और पालन-पोषण किया जा रहा है। यहाँ गौवंश के लिए पौष्टिक आहार, हरे चारे, समर्पित चिकित्सकों, गौ-चिकित्सालय और सीसीटीवी निगरानी की बेहतरीन व्यवस्था है। साथ ही, गौधाम के वेद विद्यालय में लगभग 50-60 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिन्हें भविष्य में 200 से 250 तक पहुँचाने का संकल्प है। ब्रजभूमि को निराश्रित गौवंश मुक्त बनाने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक कदम है। इसके पश्चात कामवन स्थित प्राचीन श्री नरसिंह भगवान मंदिर के महंत श्री धनंजय दास जी महाराज ने आगामी आयोजनों की रूपरेखा साझा की।
प्रमाद है वास्तविक आध्यात्मिक मृत्यु
श्रीकृष्ण गीतावली के सुंदर पदों के गायन के साथ मुख्य कथा का आरंभ करते हुए स्वामी राजेंद्र दास जी महाराज ने नैमिषारण्य के प्रसंग के माध्यम से विद्या प्राप्ति और भगवत्प्राप्ति के लिए सांसारिक सुखों की आसक्ति और प्रमाद के त्याग का महत्व समझाया।
महाराज जी ने महाभारत के सनत्सुजात और धृतराष्ट्र संवाद का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि साधना, भजन और भगवद्स्मरण में प्रमाद करना ही वास्तविक आध्यात्मिक मृत्यु है। उन्होंने धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जीवन के अंतिम क्षणों और वृद्धावस्था में भी उन्होंने अपनी भजन-साधना में कभी आलस्य या प्रमाद को आड़े नहीं आने दिया।
परम धर्म और भगवत लीलाओं का महात्म्य
महाराज जी ने कहा कि भारतभूमि में प्राप्त यह दुर्लभ मानव जीवन केवल भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि भगवत्प्राप्ति के लिए है। भगवान के अवतार और दिव्य लीलाओं का उद्देश्य जीवों का कल्याण करना और प्रेमरूपी दिव्य संपदा का वितरण करना है। उन्होंने निष्काम ज्ञान, निष्काम वैराग्य और भगवन्नाम संकीर्तन को ही जीवन का परम धर्म बताया।
संत-महात्माओं की रही पावन उपस्थिति
कथा के द्वितीय दिवस को अलंकृत करने के लिए श्रीमद् जगद्गुरु श्री भावानंदाचार्य जी महाराज, फर्रुखाबाद के दुर्वासा आश्रम के पीठाधीश्वर, चित्रकूट से पधारे महंत श्री सीताराम दास जी महाराज, कुरुक्षेत्र से पधारे महंत श्री रघुनाथ दास जी महाराज और सुप्रसिद्ध कथावाचक श्री धीरज कृष्ण शास्त्री सहित देश के कई प्रख्यात संत-महात्मा उपस्थित रहे। संतों के सान्निध्य से संपूर्ण कथा परिसर पूरी तरह भक्तिमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत नजर आया।

