जड़खोर गौधाम में गूंजी श्रीकृष्ण-बलराम की बाललीलाएं: जगद्गुरु द्वाराचार्य स्वामी राजेंद्र दास ने सुनाई वैराग्य और गौसेवा की महिमा
डीग (14 अक्टूबर) नीरज जैन : डीग जिले के प्रतिज्ञा वन स्थित श्री जड़खोर गौधाम में आयोजित नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर बुधवार का पूरा परिसर भक्ति-रस से सराबोर नजर आया। कार्यक्रम में अग्रपीठाधीश्वर मलूकपीठाधीश्वर जगद्गुरु द्वाराचार्य स्वामी राजेंद्र दास जी महाराज ने श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण-बलराम की दिव्य लीलाओं, संतों के त्याग-वैराग्य और लोभ के दुष्परिणामों का बड़ा ही भावपूर्ण वर्णन करते हुए धर्म और भगवद्भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
गौमाता की सेवा और संतों के सान्निध्य का महत्व कथा के आरंभ में दीनबंधु दास महाराज ने फर्रुखाबाद के दुर्वासा आश्रम से पधारे विपिन बिहारी दास जी महाराज और अन्य संतगणों का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि भगवान को रिझाने का सबसे सरल और उत्तम मार्ग संतों, सद्गुरु और गौमाता की सेवा करना है। गोबर, गोमूत्र, दूध और घी जैसे गव्य पदार्थों का आध्यात्मिक महत्व बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार में चाहे कितनी भी प्रतिष्ठा मिल जाए, गौमाता के प्रति सच्ची श्रद्धा के बिना वास्तविक कल्याण संभव नहीं है।
इस दौरान यजमान परिवार द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच व्यासपीठ और श्रीमद्भागवत जी का विधिवत पूजन किया गया। इसके बाद परमपूज्य श्री गणेशदास जी भक्तमाली वेद-वेदांग महाविद्यालय के बटुकों द्वारा प्राचीन संस्कृत शास्त्रार्थ की सुंदर प्रस्तुति दी गई।
श्रीकृष्ण-बलराम की लीलाएं और परीक्षित की महिमा महाराज जी ने राजा परीक्षित की महिमा का बखान करते हुए कहा कि उन्हीं के निमित्त से संपूर्ण संसार को भगवान श्रीकृष्ण की पावन कथाएं सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने महाभारत के प्रसंग सुनाते हुए पाण्डवों की विजय, दुर्योधन और भीमसेन के बीच गदायुद्ध तथा कुरुक्षेत्र की तीर्थ-महिमा का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने क्रोधित बलराम जी को शांत कर धर्म और न्याय का मार्ग दिखाया।
संतत्व की पहचान बताते हुए उन्होंने कहा कि महान संतों का सरल स्वभाव, कोमल हृदय, त्याग, वैराग्य और दीनता ही उनके सच्चे आचरण की पहचान है।
लोभ बनता है वैर की जड़ मलूकदास महाराज की प्रेरक साखी सुनाते हुए स्वामी राजेंद्र दास जी ने श्रद्धालुओं को चेताया कि लोभ मनुष्य को धर्म, न्याय और वचनपालन से भटकाकर बड़े संघर्षों और वैर का कारण बनता है। उन्होंने राजा द्रुपद और गुरु द्रोणाचार्य के प्रसंग के माध्यम से यह समझाया कि लोभ और अहंकार मनुष्य के जीवन में किस प्रकार दूरियां पैदा करते हैं। अंत में उन्होंने सभी से सांसारिक मोह-माया और लोभ का त्याग कर संतों के आदर्शों पर चलने और भगवद्भक्ति के मार्ग को अपनाने का आह्वान किया।

